अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #06 · पैसा कमाई बनाम ईमानदारी

एक मौका है जिससे जल्दी बहुत पैसा बनेगा, पर तरीका पूरी तरह सही नहीं है। आप क्या करेंगे?

ऐसे मौके अक्सर “सब यही करते हैं” के साथ आते हैं।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता धन के विरोध में नहीं है, पर उसके तरीके पर साफ़ है। कमाई ईमानदार हो, और उसमें दूसरों का हिस्सा भी हो (3.12–13)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. मौका ले लूँगा — गीता 16.12 “अन्यायपूर्वक धन-संचय” को आसुरी स्वभाव में गिनती है, और लोभ को नरक के तीन द्वारों में (16.21)।

B. थोड़ा-सा ले लूँगा, ज़्यादा नहीं — गीता मात्रा की नहीं, दिशा की बात करती है। 18.31 उस बुद्धि को राजसी कहता है जो धर्म-अधर्म को ठीक से नहीं पहचानती — “थोड़ा-सा” अक्सर यहीं से शुरू होता है।

C. मना कर दूँगा — गीता शुद्ध व्यापार को स्वाभाविक कर्म बताती है (18.44), और कहती है कि लोभ के द्वार से बचकर चलने वाला अपने कल्याण का आचरण करता है (16.22)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 16.12 श्रीकृष्ण

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥

हिंदी अर्थवे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।

रोमन में पढ़ें

āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ
īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.21 श्रीकृष्ण

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

हिंदी अर्थकाम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।

रोमन में पढ़ें

tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ
kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.22 श्रीकृष्ण

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन ! इन नरकके तीनों दरवाजोंसे रहित हुआ जो मनुष्य अपने कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

etair vimuktaḥ kaunteya tamo-dvārais tribhir naraḥ
ācharaty ātmanaḥ śhreyas tato yāti parāṁ gatim

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 18.44 श्रीकृष्ण

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥

हिंदी अर्थखेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।

रोमन में पढ़ें

kṛiṣhi-gau-rakṣhya-vāṇijyaṁ vaiśhya-karma svabhāva-jam
paricharyātmakaṁ karma śhūdrasyāpi svabhāva-jam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.31 श्रीकृष्ण

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।

रोमन में पढ़ें

yayā dharmam adharmaṁ cha kāryaṁ chākāryam eva cha
ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 3.12 श्रीकृष्ण

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥

हिंदी अर्थयज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है।

रोमन में पढ़ें

iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ
tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.13 श्रीकृष्ण

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

हिंदी अर्थयज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं।

रोमन में पढ़ें

yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ
bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt

अध्याय 3 · कर्मयोग

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