एक मौका है जिससे जल्दी बहुत पैसा बनेगा, पर तरीका पूरी तरह सही नहीं है। आप क्या करेंगे?
ऐसे मौके अक्सर “सब यही करते हैं” के साथ आते हैं।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता धन के विरोध में नहीं है, पर उसके तरीके पर साफ़ है। कमाई ईमानदार हो, और उसमें दूसरों का हिस्सा भी हो (3.12–13)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. मौका ले लूँगा — गीता 16.12 “अन्यायपूर्वक धन-संचय” को आसुरी स्वभाव में गिनती है, और लोभ को नरक के तीन द्वारों में (16.21)।
B. थोड़ा-सा ले लूँगा, ज़्यादा नहीं — गीता मात्रा की नहीं, दिशा की बात करती है। 18.31 उस बुद्धि को राजसी कहता है जो धर्म-अधर्म को ठीक से नहीं पहचानती — “थोड़ा-सा” अक्सर यहीं से शुरू होता है।
C. मना कर दूँगा — गीता शुद्ध व्यापार को स्वाभाविक कर्म बताती है (18.44), और कहती है कि लोभ के द्वार से बचकर चलने वाला अपने कल्याण का आचरण करता है (16.22)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थवे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।
हिंदी अर्थखेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।
हिंदी अर्थयज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है।
रोमन में पढ़ें
iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ
tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ
गीता 3.13श्रीकृष्ण
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
हिंदी अर्थयज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं।
रोमन में पढ़ें
yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ
bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt