अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #10 · रिश्ते और दोस्ती तुलना बनाम अपनी राह

आपका दोस्त आपसे आगे निकल गया — नौकरी, पैसा, इज़्ज़त। मन में जलन हो रही है। आप क्या करेंगे?

तुलना आज हर तरफ़ है — सोशल मीडिया से लेकर रिश्तेदारों की बातों तक।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता तुलना से नहीं, स्वधर्म से चलने को कहती है। दूसरों के प्रति द्वेष-रहित रहना और अपने कर्म में लगे रहना — दोनों साथ-साथ।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. उसकी कमियाँ ढूँढूँगा — गीता दोष-दृष्टि को बार-बार बाधा बताती है (3.32), और द्वेष व दोष-दृष्टि को आसुरी लक्षणों में गिनती है (16.18)।

B. खुद को कोसूँगा — गीता 6.5 कहती है — अपने द्वारा अपना उद्धार करो, अपना पतन नहीं। खुद को नीचा देखना भी अपना ही शत्रु बनना है।

C. उसकी खुशी में खुश होकर अपनी राह पर लगूँगा — यह भगवान के प्रिय भक्त के लक्षणों के करीब है — किसी से द्वेष नहीं, सबका मित्र (12.13), और ईर्ष्या (अमर्ष) से रहित (12.15)। साथ में अपनी राह, अपना धर्म (3.35)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 12.13 से 12.14 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ 12.13 ॥
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ 12.14 ॥

हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī
santuṣhṭaḥ satataṁ yogī yatātmā dṛiḍha-niśhchayaḥ
mayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 12.15 श्रीकृष्ण

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥

हिंदी अर्थजिससे किसी प्राणीको उद्वेग नहीं होता और जिसको खुद भी किसी प्राणीसे उद्वेग नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेगसे रहित है, वह मुझे प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate cha yaḥ
harṣhāmarṣha-bhayodvegair mukto yaḥ sa cha me priyaḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 4.22 श्रीकृष्ण

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

हिंदी अर्थजो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

रोमन में पढ़ें

yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ
samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 3.35 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 6.5 श्रीकृष्ण

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

हिंदी अर्थअपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

रोमन में पढ़ें

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet
ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 3.32 श्रीकृष्ण

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥

हिंदी अर्थपरन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोष-दृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते, उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो।

रोमन में पढ़ें

ye tvetad abhyasūyanto nānutiṣhṭhanti me matam
sarva-jñāna-vimūḍhāns tān viddhi naṣhṭān achetasaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 16.18 श्रीकृष्ण

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥

हिंदी अर्थवे अहङ्कार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोधका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने और दूसरोंके शरीरमें रहनेवाले मुझ अन्तर्यामीके साथ द्वेष करते हैं तथा (मेरे और दूसरोंके गुणोंमें) दोष-दृष्टि रखते हैं।

रोमन में पढ़ें

ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ cha sanśhritāḥ
mām ātma-para-deheṣhu pradviṣhanto ’bhyasūyakāḥ

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

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