अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #41 · पैसा दान बनाम बचत

महीने के आख़िर में थोड़े पैसे बचे हैं। एक ज़रूरतमंद परिवार को मदद चाहिए, पर आपको भी अपने भविष्य के लिए बचाना है। आप क्या करेंगे?

मदद करने का मन है, पर अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी हैं।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता दान को छोड़ने योग्य नहीं मानती (18.5)। सात्त्विक दान वह है जो कर्तव्य समझकर, ज़रूरतमंद को, बिना किसी बदले की आशा के दिया जाए (17.20) — छोटा हो तो भी।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. सब बचाऊँगा — अपने घर की ज़िम्मेदारी ज़रूरी है। पर गीता 3.13 कहती है कि बाँटकर बचा हुआ लेने वाले शुद्ध होते हैं, और जो केवल अपने लिए ही जुटाते हैं वे पाप के भागी बनते हैं। घर संभालना गलत नहीं — बाँटना बिल्कुल छोड़ देना गीता के भाव से दूर है।

B. जितना है, सब दे दूँगा — भावना सुंदर है। पर गीता हर चीज़ में संतुलन — “यथायोग्य” — की बात करती है (6.17)। खुद को मुश्किल में डालकर दिया दान बाद में पछतावा न बन जाए।

C. थोड़ा ज़रूर दूँगा, बाकी बचाऊँगा — यह गीता के सात्त्विक दान के करीब है — “देना कर्तव्य है” इस भाव से, सही समय पर, सही व्यक्ति को, बिना बदले की उम्मीद के दिया दान (17.20)। दान, यज्ञ और तप कभी छोड़ने नहीं चाहिए (18.5)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 17.20 श्रीकृष्ण

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थदान देना कर्तव्य है -- ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe
deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.21 श्रीकृष्ण

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थकिन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśhya vā punaḥ
dīyate cha parikliṣhṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 18.5 श्रीकृष्ण

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

हिंदी अर्थयज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।

रोमन में पढ़ें

yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tat
yajño dānaṁ tapaśh chaiva pāvanāni manīṣhiṇām

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 3.13 श्रीकृष्ण

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

हिंदी अर्थयज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं।

रोमन में पढ़ें

yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ
bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 6.17 श्रीकृष्ण

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

रोमन में पढ़ें

yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā

अध्याय 6 · ध्यानयोग

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