अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #16 · काम आदेश बनाम ईमानदारी

बॉस कह रहा है कि रिपोर्ट में आँकड़े थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर लिख दो। आप क्या करेंगे?

मना करने पर नौकरी में परेशानी हो सकती है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता सत्य को दैवी गुणों में गिनती है और डर से किए कर्म को दुर्बलता। सच पर टिकना, पर कड़वाहट के बिना — यही संतुलन है।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. लिख दूँगा — डर से गलत काम करना — गीता “अभय” को पहला दैवी गुण कहती है (16.1), और उस बुद्धि को राजसी जो धर्म-अधर्म को ठीक से न पहचाने (18.31)।

B. साफ़ मना कर दूँगा — सत्य पर टिकना दैवी गुण है (16.2)। साथ में 17.15 याद दिलाता है कि सच भी ऐसे कहा जाए कि उद्वेग न करे।

C. विनम्रता से मना करके दूसरा रास्ता सुझाऊँगा — यह गीता के सबसे करीब है — सत्य भी (16.2) और वाणी का तप भी: सत्य, प्रिय और हितकारी (17.15)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 16.1 श्रीकृष्ण

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥

हिंदी अर्थभयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।

रोमन में पढ़ें

śhrī-bhagavān uvācha
abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.2 श्रीकृष्ण

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

हिंदी अर्थअहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।

रोमन में पढ़ें

ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam
dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 18.31 श्रीकृष्ण

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।

रोमन में पढ़ें

yayā dharmam adharmaṁ cha kāryaṁ chākāryam eva cha
ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.32 श्रीकृष्ण

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है।

रोमन में पढ़ें

adharmaṁ dharmam iti yā manyate tamasāvṛitā
sarvārthān viparītānśh cha buddhiḥ sā pārtha tāmasī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

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