अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #42 · परिवार बड़ों का आदर बनाम सही बात

घर के एक बड़े, बीमार परिजन का डॉक्टरी इलाज छुड़वाकर झाड़-फूँक पर ज़ोर दे रहे हैं। आप क्या करेंगे?

बड़ों की बात काटना संस्कार के ख़िलाफ़ लगता है — पर यहाँ किसी की सेहत दाँव पर है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता बड़ों के आदर को मानती है, पर जब किसी का जीवन दाँव पर हो तो सही कर्तव्य को आगे रखती है — अर्जुन की दुविधा यही थी (2.4, 2.31)। बात सच्ची हो, पर प्रेम और आदर से कही जाए (17.15)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. बड़ों की बात है, चुप रहूँगा — अर्जुन भी भीष्म और द्रोण के आदर में उलझे थे — “ये तो पूजनीय हैं” (2.4)। कृष्ण ने आदर को नहीं नकारा, पर कहा कि अपने कर्तव्य को देखकर विचलित नहीं होना चाहिए (2.31)। चुप रहना भी एक फ़ैसला है — और यहाँ उसका असर किसी की सेहत पर पड़ेगा।

B. सबके सामने उन्हें गलत ठहराऊँगा — बात सही हो सकती है, पर कठोरता और अभिमान को गीता आसुरी लक्षण कहती है (16.4)। चोट पहुँचाने वाली वाणी अक्सर सही बात को भी अनसुना करवा देती है।

C. आदर से, पर मज़बूती से बात रखूँगा — यह गीता के करीब है — वाणी सच्ची, प्रिय और हितकारी हो (17.15), और बुद्धि यह पहचाने कि कब क्या करना है और क्या नहीं (18.30)। आदर और सही कर्तव्य, दोनों साथ निभ सकते हैं।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.4 अर्जुन

कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥

हिंदी अर्थहे मधुसूदन! मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ? क्योंकि हे अरिसूदन! ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं।

रोमन में पढ़ें

arjuna uvācha
kathaṁ bhīṣhmam ahaṁ sankhye droṇaṁ cha madhusūdana
iṣhubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvari-sūdana

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.31 श्रीकृष्ण

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥

हिंदी अर्थअपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।

रोमन में पढ़ें

swa-dharmam api chāvekṣhya na vikampitum arhasi
dharmyāddhi yuddhāch chhreyo ’nyat kṣhatriyasya na vidyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 16.4 श्रीकृष्ण

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

रोमन में पढ़ें

dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha
ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 18.30 श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

रोमन में पढ़ें

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye
bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

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