अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #05 · काम अपनी राह बनाम दूसरों की राह

सब कहते हैं “वो करियर चुनो जिसमें पैसा है”, पर आपका मन किसी और काम में है। आप क्या करेंगे?

पढ़ाई, नौकरी, कारोबार — दूसरों की सफल राह अक्सर अपनी राह से ज़्यादा सुरक्षित लगती है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता “स्वधर्म” पर ज़ोर देती है — अपने स्वभाव के अनुसार कर्म। हर कर्म में कुछ न कुछ दोष होता है (18.48), इसलिए “परफ़ेक्ट” राह ढूँढने से बेहतर है अपनी राह पर पूरी निष्ठा।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. जो सब चुन रहे हैं, वही चुनूँगा — 3.35 कहता है — दूसरे का धर्म अच्छी तरह निभाने से, कमियों के साथ भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। दूसरे की राह को वहाँ “भय देने वाला” बताया गया है।

B. मन की सुनूँगा, बिना ज़्यादा सोचे — गीता स्वभाव को महत्व देती है (18.47), पर 18.30 सात्त्विक बुद्धि उसे कहता है जो कर्तव्य-अकर्तव्य को ठीक से पहचाने — केवल पसंद नहीं, विवेक भी।

C. अपना स्वभाव समझकर चुनूँगा — यह गीता के स्वधर्म के करीब है — स्वभाव से नियत कर्म करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता (18.47), और अपने कर्म से ही ईश्वर का पूजन होता है (18.46)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 3.35 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 18.45 श्रीकृष्ण

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥

हिंदी अर्थअपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।

रोमन में पढ़ें

sve sve karmaṇy abhirataḥ sansiddhiṁ labhate naraḥ
sva-karma-nirataḥ siddhiṁ yathā vindati tach chhṛiṇu

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.46 श्रीकृष्ण

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam
sva-karmaṇā tam abhyarchya siddhiṁ vindati mānavaḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.47 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
svabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.48 श्रीकृष्ण

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।

रोमन में पढ़ें

saha-jaṁ karma kaunteya sa-doṣham api na tyajet
sarvārambhā hi doṣheṇa dhūmenāgnir ivāvṛitāḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.30 श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

रोमन में पढ़ें

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye
bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

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