किसी बहुत अपने के जाने को महीनों हो गए, पर मन अब भी वहीं अटका है। आप क्या करेंगे?
अर्जुन का विषाद भी अपनों को खोने के डर से शुरू हुआ था।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता का उपदेश ही शोक से शुरू होता है। श्रीकृष्ण आत्मा की नित्यता समझाकर अर्जुन को शोक से कर्तव्य की ओर ले जाते हैं।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. दुःख में ही रहूँगा — गीता दुःख को गलत नहीं कहती, पर 2.11 कहता है कि ज्ञानी न जाने वालों के लिए शोक करते हैं, न रहने वालों के लिए — क्योंकि आत्मा नष्ट नहीं होती (2.20)।
B. सब भूलकर व्यस्त हो जाऊँगा — यह दुःख से भागना भी हो सकता है। गीता भूलने को नहीं, समझने को कहती है — जैसे पुराने कपड़े छोड़कर नए पहने जाते हैं (2.22), वैसे ही जीवन का यह परिवर्तन।
C. याद रखते हुए आगे बढ़ूँगा — यह गीता के दृष्टिकोण के करीब है — जन्मे की मृत्यु निश्चित है और यह क्रम टल नहीं सकता (2.27), इसलिए शोक से ऊपर उठकर अपना कर्तव्य निभाना ही आगे का रास्ता है।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थतुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो; परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये पण्डितलोग शोक नहीं करते।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
aśhochyān-anvaśhochas-tvaṁ prajñā-vādānśh cha bhāṣhase
gatāsūn-agatāsūnśh-cha nānuśhochanti paṇḍitāḥ
गीता 2.13श्रीकृष्ण
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
हिंदी अर्थदेहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।
रोमन में पढ़ें
dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā
tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati
गीता 2.20श्रीकृष्ण
न जायते म्रियते वा कदाचि
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
हिंदी अर्थयह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।
रोमन में पढ़ें
na jāyate mriyate vā kadāchin
nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo
na hanyate hanyamāne śharīre
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
हिंदी अर्थक्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
रोमन में पढ़ें
jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha
tasmād aparihārye ’rthe na tvaṁ śhochitum arhasi
गीता 2.28श्रीकृष्ण
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥
हिंदी अर्थहे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?
रोमन में पढ़ें
avyaktādīni bhūtāni vyakta-madhyāni bhārata
avyakta-nidhanānyeva tatra kā paridevanā
हिंदी अर्थहे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।