आपके सामने किसी कमज़ोर के साथ गलत हो रहा है, बोलने पर आपको भी परेशानी होगी। आप क्या करेंगे?
बाक़ी लोग देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
अर्जुन की पूरी कथा अन्याय के सामने खड़े होने की है। गीता कहती है — धर्म के लिए खड़े हो, पर द्वेष और आवेग से नहीं, विवेक से (2.38)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. चुप रहूँगा — गीता कहती है अपने धर्म से पीछे हटना भी दोष है (2.33), और श्रेष्ठ लोग प्राणिमात्र के हित में लगे रहते हैं (5.25)।
B. तुरंत बीच में कूद पड़ूँगा — हिम्मत दैवी गुण है (16.1, “अभय”)। पर गीता बिना परिणाम और सामर्थ्य देखे किए कर्म को तामस भी कहती है (18.25)।
C. सोच-समझकर मदद करूँगा — यह साहस और विवेक का मेल है — प्राणियों के हित में रत (5.25), और परिणाम देखकर सोचा-समझा कर्म (18.30)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
इन श्लोकों में देखें
इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक
गीता 2.31श्रीकृष्ण
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
हिंदी अर्थअपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।
रोमन में पढ़ें
swa-dharmam api chāvekṣhya na vikampitum arhasi
dharmyāddhi yuddhāch chhreyo ’nyat kṣhatriyasya na vidyate
गीता 2.33श्रीकृष्ण
अथ चैत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥
हिंदी अर्थअब अगर तू यह धर्ममय युद्ध नहीं करेगा, तो अपने धर्म और कीर्तिका त्याग करके पापको प्राप्त होगा।
रोमन में पढ़ें
atha chet tvam imaṁ dharmyaṁ saṅgrāmaṁ na kariṣhyasi
tataḥ sva-dharmaṁ kīrtiṁ cha hitvā pāpam avāpsyasi
हिंदी अर्थजिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।