गीता 9.6
कुंडलीपंचांग

भगवद्गीता · अध्याय 9 · श्लोक 6

गीता 9.6

अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता 9.6 श्रीकृष्ण

यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥

हिंदी अर्थजैसे सब जगह विचरनेवाली महान् वायु नित्य ही आकाशमें स्थित रहती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित रहते हैं -- ऐसा तुम मान लो।

रोमन में पढ़ें

yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān
tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānītyupadhāraya

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। शीर्षक, सरल भावार्थ, मुख्य शब्द और "आज के जीवन में" SachiBhakti की ओर से।